सोच बदलें तभी समाज बदलेगा…

आनंद कौशल/ प्रधान संपादक, देश-प्रदेश मीडिया

वीआईपी संस्कृति खत्म करने की दिशा में लाल बत्ती का निषेध भले ही ऐतिहासिक फैसला ना हो लेकिन इतना तो जरूर है कि आम लोगों के बीच समानता का भाव असाधारण नहीं है। मई दिवस के मौके पर ब्यूरोक्रेट्स और मंत्रियों की गाड़ियों से लाल बत्ती हटाकर लोगों के बीच यही संदेश देने की कोशिश की गयी है कि अधिकारी या मंत्री जनता के सेवक हैं और वोटरों के वोटों से जीतकर सांसद या मंत्री बनने वाले नेता भी यह मान लें कि वो अपने कार्यों की बदौलत जाने जाएं ना कि वीआईपी चलन की वज़ह से। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दूसरा फैसला भी आज के ही दिन से लागू हो रहा है वो भी एक नजीर की तरह है क्योंकि स्वच्छता अभियान में सबसे बड़ा रोड़ा खुद हम ही बनते हैं। मोदी के नए फैसले के मुताबिक महिला या बच्चे हाइवे अथवा सफर के रास्ते में किसी भी होटल या रेस्तेरां के बाथरूम का प्रयोग कर सकते हैं वो भी निशुल्क। इस बावत कानून में संशोधन कर प्रधानमंत्री ने भारत के लोगों को स्वच्छता अभियान के लिए खुद प्रेरीत कर दिया है। महात्मा गांधी कहते थे स्वच्छता में ही भगवान बसते हैं लिहाजा गांधी को सच्ची श्रद्धांजलि उनके विचारों को अमली जामा पहनाने से ही संभव होगा। नरेंद्र मोदी के दोनों फैसले आम जनता के लिए ही है क्योंकि एक फैसले ने देश के अंदर वीआईपी सोच को नेस्तनाबूद किया है तो दूसरे ने आम लोगों के सफर को सुहाना बना दिया है। विपक्ष या विरोधी चाहे जो चिल्ल-पो करे लेकिन लाल बत्ती ने पूरे सिस्टम को दो हिस्सों में बांट दिया था। उदाहरण के तौर पर आज हर घर में माता-पिता अपने बच्चों को इंजीनियर या डॉक्टर तो बनाना चाहते हैं लेकिन अगर उनके बच्चे आईएएस अथवा आईपीएस बन जाए तो उनकी खुशी ज्यादा बढ़ जाती है। ज़ाहिर है यह वीआईपी संस्कृति की चाहत का ही नमूना है क्योंकि पैसे के साथ पावर भी इसी नौकरी में मिलता है जो दूसरी जगह उन्हें संतोष नहीं देता। अब अगर गाड़ियों पर लाल-नीली बत्ती नहीं रहेगी तो सड़कों पर कौन पूछेगा कि कौन जा रहा है, किसे पता चलेगा कि अमुक गाड़ियों पर कौन वीवीआईपी बैठा है। ठीक ही कहा गया है पहले सोच बदलें तभी समाज बदलेगा। मई दिवस के मौके पर वीआईपी कल्चर की तिलांजलि हालांकि इतनी जल्दी नहीं हो पाएगी क्योंकि अभी सोच बदलने में भी वक्त लगेगा लेकिन किसी भी बेहतर चीज की शुरूआत कठिन ही होती है। वैसे लाल-पीली-नीली बत्ती के साथ ही सड़कों पर यातायात रोककर वीआईपी को आगे निकालने की संस्कृति भी खत्म कर दी जाए तो सड़कों पर यातायात पर बोझ स्वत: खत्म हो जाएगा। महामहिम, मुख्यमंत्री, या हाइकोर्ट के जजों को बत्तियों से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला लिहाजा प्रधानमंत्री से जनता की ये उम्मीदें भी हैं कि यातायात में अवरोध पैदा कर वीआईपी को रास्ता देने का चलन भी जल्द खत्म हो। कई पश्चिमी देशों में तो राष्ट्राध्यक्ष भी इतने ताम-झाम से नहीं चलते जितना हमारे यहां कैबिनेट मंत्रियों अथवा राज्य प्रमुख चलते हैं। यही नहीं कई देशों में स्कूली बच्चों की गाड़ियों को वीआईपी से आगे जाने की इजाजत दी जाती है जबकि हमारे यहां इन्हीं मासूमों को घंटों ना चाहते हुए भी वीवीआईपी के लिए रूकना पड़ता है। इससे समय की बर्बादी तो होती ही है व्यर्थ में यातायात अवरूद्ध रहता है। वैसे इसके लिए राज्य के मुख्यमंत्रियों अथवा राज्याध्यक्षों को खुद आगे आना होगा और वीआईपी कल्चर को खत्म करने का साहस दिखाना होगा। हालांकि उनके जीवन पर खतरे को देखते हुए उन्हें सुरक्षा घेरा जरूर मिले लेकिन आमलोगों की शर्तों पर नहीं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पहले राजा ही प्रजा की रक्षा करते थे और आज इतिहास की उसी बात को नज़रअंदाज कर हम पूरी ताक़त उनकी सुरक्षा में लगा देते हैं। मई दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री वीआईपी सोच को भी खत्म करने का साहस दिखाएं तो जनता का वास्तविक भला होगा, साथ ही लाखों-करोड़ों बच्चों की दुआएं भी मिलेंगी।

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