थोड़ा है थोड़े की ज़रूरत है…

आनंद कौशल/ प्रधान संपादक, देश-प्रदेश मीडिया

राजगीर में राजद का चिंतन सह प्रशिक्षण शिविर संपन्न हो गया और इसके साथ ही ये भी तय हो गया कि राजद की कमान पूरी तरह से तेजस्वी यादव के कंधे पर सौंपी जाएगी। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं कि राजद में लालू परिवार के अंदर मीसा भारती के बाद तेजस्वी ही सबसे योग्य हैं और पिता के भरोसे के काबिल भी। प्रशिक्षण शिविर में लालू प्रसाद ने कार्यकर्ताओं को जहां जीत का मंत्र दिया वहीं भाजपा से मुक़ाबले के लिए एकता को जरूरी बताया। जिस तरह से भाजपा के हमले लगातार लालू परिवार को परेशान कर रहा है उसके हिसाब से राजगीर के प्रशिक्षण शिविर को जरूरी कहा जा सकता है। शिविर में लालू प्रसाद ने राजद संसदीय दल के अध्यक्ष के लिए तेजस्वी का नाम आगे कर दिया और पार्टी के वरीय नेताओं ने इसपर अपनी सहमति भी जता दी लेकिन सवाल अब ये है कि आखिर संसदीय दल का अध्यक्ष अभी बनाये जाने की जल्दी क्या थी? जानकारों की मानें तो भाजपा को हराने के लिए लालू प्रसाद सभी सेक्यूलर दलों का महागठबंधन बनाने की वकालत कर चुके हैं। महागठबंधन के अंदर कई दलों को जोड़े जाने की कोशिशें शुरू कर दी गयी हैं लेकिन लालू जानते हैं कि दलों के मिलने से ज्यादा जरूरी दिलों का मिलना है, यानी 2019 के चुनाव से पहले कौन दल किसके साथ जाएगा फिलहाल कह पाना मुश्किल है लेकिन महागठबंधन की बुनियाद मजबूत हो गयी तब भी ये जरूरी नहीं कि प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के नाम पर आम सहमति बन पाए। राजद सुप्रीमो चाहते हैं कि तेजस्वी राष्ट्रीय फलक पर देश का नेतृत्व करें लेकिन संभावनाओं से इतर अगर वो इसमें सफल ना भी हो पाएं तो बिहार की सत्ता हासिल की जा सके। नीतीश कुमार के गढ़ में प्रशिक्षण शिविर यूं ही नहीं आयोजित किया गया बल्कि लगे हाथ पार्टी ने महागठबंधन के घटक दलों को ये एहसास भी कराने की कोशिश की कि भाजपा के खिलाफ़ लड़ाई में वो मिलकर साथ निभाएं ना कि राजद को अलग-थलग करने की कोशिश करें। राजद को ये भी लग रहा है कि फिलहाल पार्टी का स्वर्णिम काल है और अभी तेजस्वी की ताजपोशी का इससे बेहतर वक्त नहीं हो सकता। लालू ने एक ही तीर से कई शिकार किए हैं और राजद के अंदर भी तमाम वरीय नेताओं को तेजस्वी का साथ देने की नसीहत भी दी गयी है क्योंकि युवा चेहरे के नाम पर कोई भी नेता लालू के फैसले की मुखालफत नहीं कर पा रहे हैं। तेजस्वी फिलहाल राज्य के उपमुख्यमंत्री हैं लेकिन शिलान्यास और उद्घाटन के अलावा उनकी खास पहचान नहीं बन पायी है लिहाजा जिम्मेदारी से पहले तेजस्वी को अपनी कार्यकुशलता का ज़ौहर भी दिखाना पड़ेगा। पार्टी के अंदर एक बड़ा धड़ा तेजस्वी को सत्ता सौंपने की वकालत करते रहे हैं और वक्त का तक़ाजा भी यही है कि राजद के अंदर नीति-निर्देशकों का समय भी खराब चल रहा है लिहाजा फैसले की आलोचना करने का साहस भी उनलोगों को नहीं है। शहाबुद्दीन, तस्लीमुद्दीन, प्रभुनाथ सिंह औऱ फातिमी जैसे नेता लालू के हां में हां मिलाने के सिवा कुछ नहीं कर पा रहे। रघुवंश प्रसाद सिंह भी लालू के फैसले को स्वीकार कर चुके हैं। इधर, नीतीश कुमार के नाम पर तमाम दलों के अंदर सहमति बने ना बने लालू ने अगले चुनाव की रूपरेखा तैयार कर दी है। लालू जानते हैं कि मोदी से मुक़ाबले में अगर नीतीश महागठबंधन के स्वाभाविक उम्मीदवार बनते हैं तो तेजस्वी के लिए बिहार की सत्ता खाली हो जाएगी, दूसरी ओर अगर महागठबंधन में पेंच फंसेगा तो तेजस्वी के नाम को भी आगे किया जा सकता है। संसदीय दल का अध्यक्ष बनाने की औपचारिकता पूरी कर तेजस्वी को यादवों और युवाओं के चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट करने की तैयारी है। हालांकि जिस तरह से भाजपा के वरिष्ठ नेता सुशील मोदी राजद परिवार पर हमले तेज कर रहे हैं और कानून व्यवस्था के सवाल पर भी पार्टी विपक्ष के निशाने पर है उससे निकलने के लिए पार्टी को अभी जनता को विश्वास में लेना होगा। हालांकि विपक्ष के दावे को भी लालू ने चुनौती देकर कहा कि उनका और जदयू का गठबंधन अटूट है और मोदी को आगामी लोकसभा चुनाव में वो पटखनी देने की रणनीति बना रहे हैं। बहरहाल, लोकसभा चुनाव को अभी काफी वक्त शेष है लेकिन प्रशिक्षण शिविर के बहाने लालू ने पार्टी के अंदर नई जान फूंकने की कोशिश की है, साथ ही सुशील मोदी के हमले को लेकर जिस तरह से पार्टी के अंदर ऊहापोह की स्थिति थी उससे भी पार्टी अब उबरने लगी है। लालू प्रसाद को राजनीति का किंग मेकर कहा जाता है और उनपर राजद को फैमिली पार्टी बनाने के आरोप भी हमेशा से लगते रहे हैं लेकिन चौंकाने वाले फैसले करने वाले लालू ने तेजस्वी को संसदीय दल का अध्यक्ष बनाए जाने की घोषणा कर सियासी महत्वाकांक्षा को उजागर कर दिया है। ये दिल मांगे मोर वाली बात साबित कर लालू ने जदयू को भी लगे हाथ संकेत दे दिया है कि राजनीति में अवसर सबके लिए खुले होते हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि लालू प्रसाद की सियासत के इस बाउंसर का जवाब जदयू अथवा कांग्रेस किस रूप में देती है।

You May Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *