भारत के कूटनीतिक दांव से चिंतित हुआ चीन

आनंद कौशल/ प्रधान संपादक, देश प्रदेश.मीडिया

भारत का रिश्ता अपने कुछ पड़ोसियों से भले ही बेहतर ना हो लेकिन दुनिया के ज्यादातर देशों से भारत नए रिश्ते की शुरूआत कर चुका है। भारत की वर्तमान विदेश नीति दुनिया भर में एक नए समीकरण का संकेत दे रहा है। दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका, पुराने मित्र रूस समेत जापान, फ्रांस, वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया, सिंगापुर, ब्रिटेन औऱ अब इजरायल ऐसे कई नाम हैं जिनसे भारत का वर्तमान राजनयिक संबंध काफी मजबूत बना है औऱ पिछले कुछ सालों में जिस भारत को दुनिया के नक्शे पर थका-हारा समझा जाने लगा था उसमें बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। अमेरिका तो पहले से मोदी का मुरीद था और अब इजरायल के वर्तमान दौरे ने भारत और इजरायल के द्विपक्षीय संबंधों को और बेहतर बनाया है। कल तक चीन जिस हक के साथ भारतीय सीमा में प्रवेश करने से डरता नहीं था अब उसके भी पैंतरे बदलने लगे हैं। इजरायल के साथ भले ही हमारे वैदेशिक संबंधों के पच्चीस साल हो गए हों लेकिन प्रधानमंत्री के वर्तमान दौरे ने इन संबंधों में नए आयाम गढ़े हैं। इजरायल के तीन दिवसीय दौरे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई अहम समझौतों का फायदा सीधे भारत की जनता को देने जा रहे हैं जिसमें जल प्रबंधन, जल संरक्षण और कृषि तकनीक प्रमुख हैं। बताया जा रहा है कि भारत और इजरायल के बीच सात समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए हैं जिसमें आतंकवाद के मुद्दे पर दोनों देश साझा कार्यक्रम चलाने पर रजामंद हुए हैं। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश में गंगा की सफाई के लिए भी इजरायल मास्टर प्लान को अमली जामा पहनाएगा यानी प्रधानमंत्री का क्लीन गंगा कार्यक्रम भी रफ्तार पकड़नेवाला है। अंतरिक्ष कार्यक्रमों के लिए भी इजरायल और भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी साथ काम करने को तैयार हुए हैं।भारत और इजरायल ने साझा प्रेस कांन्फ्रेंस में इस बात को दुहराया कि आतंकवाद को लेकर दोनों देशों का नजरिया एक जैसा है। दोनों देश कट्टरपंथ के खिलाफ़ कमर कसने को तैयार हैं और वैश्विक आतंकवाद के मुद्दे पर मिलकर साझा अभियान चलाएंगे। इसके साथ ही इजरायल भारत के औद्योगिक विकास में भी अपेक्षित मदद को तैयार है इस बावत दोनों देशों के विभागों में कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए हैं। प्रधानमंत्री ने इजरायल के प्रधानमंत्री को भारत आने का न्यौता भी दिया है जिसे इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने स्वीकार भी कर लिया है। आखिर इजरायल और भारत के बीच इस ऐतिहासिक यात्रा के मायने क्या हैं आइये संक्षेप में आपको बताते हैं…

दरअसल, इजरायल के लिए भारत हथियारों का बड़ा मार्केट है। दुनिया में भारत, पाकिस्तान जैसे देश हथियारों के बड़े ग्राहक हैं इस लिहाज से भारत अकेले इजरायल से सबसे ज्यादा हथियार खरीदता है। हालांकि अमेरिका और रूस के बाद इजरायल तीसरे नंबर पर आता है लेकिन इजरायल अपने हथियार निर्यात का करीब-करीब आधा हिस्सा भारत को ही भेजता है यानी पूरी दुनिया में इजरायल के हथियारों का भारत सबसे बड़ा ग्राहक है। इजरायल ने भारत-चीन युद्ध के समय और भारत-पाक युद्ध के समय भारत की सैन्य मदद की थी। आज भी यही कारण है कि भारत चीन से भी दो-दो हाथ करने को तैयार है जिसके पीछे इजरायल की सैन्य तकनीक और हथियारों का बड़ा रोल है। भारत के अधिकांश असैन्य हवाई वाहनों का आयात भी इजरायल से होता है। इधर, भारत ने पिछले महीनों इजरायल के साथ मध्यम दूरी की सतह पर मार करने वाली मिसाइल प्रणाली के लिए दो अरब डालर के सौदे पर हस्ताक्षर भी किए थे जिसके बाद भारत सत्तर किलोमीटर तक की सीमा के भीतर विमान, मिसाइल या ड्रोन को मार गिराने की क्षमता वाला देश बन गया है।

भारत ने पश्चिमी सीमा पर भी अपनी मजबूत पकड़ बनाने की योजना को आकार दिया है क्योंकि इजरायल निर्मित स्पाइडर त्वरित प्रतिक्रिया युक्त सतह से हवा मे मार करनेवाली मिसाइल का परीक्षण कर भारत के हौंसले बुलंद हैं। वहीं, कृषि तकनीक और जल प्रबंधन और संरक्षण में इजरायल भारत के साथ पहले से काम कर रहा है तो व्यापार के मामले में भी भारत के साथ इजरायल के संबंध बेहतर हैं। इजरायल पिछले वित्तीय वर्ष में भारत का अड़तीसवां सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार रहा है। भारत ने इजरायल को 2016-17 में एक अरब डालर मूल्य के खनिज इंधन और तेलों के निर्यात किए थे। वैसे इजरायल के साथ हमारी दोस्ती की सबसे बड़ी जरूरत बस रक्षा तकनीक है जिसमें उसे महारत है। नीतियों में तकनीकी पेंच के चलते जिस अमेरिका से हमें वो घातक हथियार नहीं मिल सकते वैसे हथियार हमें इजरायल से आसानी से मिल जा रहा है। यानी कुल मिलाकर भारत आगे आने वाले कुछ सालों में अजेय बन सकता है।कूटनीतिक तौर पर इससे पहले 2000 में पूर्व गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी, 2008 में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम, 2014 में गृह मंत्री राजनाथ सिंह, 2015 में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी और 2016 में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज वहां का दौरा कर चुकी हैं लेकिन प्रधानमंत्री की इस यात्रा ने नए संबंधों को पुनर्जीवित किया है। भारत इजरायल का भले ही हथियार और रक्षा तकनीक का ग्राहक हो लेकिन जिस गर्मजोशी से मोदी का स्वागत किया गया वो बताने के लिए काफी था कि भारत के साथ इजरायल का संबंध केवल व्यापारिक साझीदार का नहीं है बल्कि रणनीतिक और कूटनीतिक तौर पर वह उसे अपना हमसफर समझे। शायद यही वज़ह है कि पिछले कुछ दिनों में चीन की बौखलाहट सतह पर दिख रही है। चीन ने भारत को 1962 से भी ज्यादा गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी है लेकिन वो शायद ये भूल जाता रहा है कि पहले का भारत और आज के भारत में बड़ा फर्क है। एक कहावत प्रचलित है कि युद्ध इरादों से जीता जाता है हथियारों से नहीं।इसका मतलब सीधा सा है कि फिलहाल जिस नेतृत्व क्षमता की बदौलत पूरी दुनिया में भारत ने अपना सिक्का जमाया है वो चीन जैसे देश को बेनकाब करने के लिए काफी है। भारत आने वाले समय में अमेरिका, जापान समेत दक्षिण एशियाई देशों के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास करने जा रहा है। ये सबक चीन को याद रखना होगा कि आज भारत विश्व के पटल पर अकेला नहीं है बल्कि भारतीय कूटनीति ने चीन को ही अलग-थलग कर दिया है। अब इस बात को लेकर चीन की चिंता जायज है कि कहीं भारत ने चीन के साथ व्यापारिक संबंधों को सीमित कर दिया तो चीन की अर्थव्यवस्था पर ही उल्टा बुरा प्रभाव ना पड़ जाए। बहरहाल, इजरायल-भारत के नए उभरते, मजबूत होते रिश्ते ने पूरी दुनिया की नींद उड़ा दी है और भारत के परेशान पड़ोसियों को भी ये मान लेना चाहिए कि भारत सीमा पार से आतंकवाद और दुस्साहस को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करने वाला

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