उपभोक्ता हितों के लिए जवाबदेही क़ानून की ज़रूरत…

आनंद कौशल/ प्रधान संपादक, देश प्रदेश.मीडिया

प्रजातंत्र में आम जनता को सबसे ज्यादा ताक़तवर माना गया है लेकिन उनकी ताक़त केवल सरकार चुनने तक ही है ऐसा कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। किसी भी लोकतंत्रांत्मक राजनीतिक व्यवस्था में जवाबदेही वो खूबसूरत उम्मीद है जो कभी पूरी नहीं हो पाती। आशय यही है कि सरकारें आती रहती हैं और जाती रहती हैं लेकिन जनता के प्रति उनकी जवाबदेही मुकम्मल नहीं बन पाती। हम सूचना का अधिकार बिल लेकर आए, जजों के लिए न्यायिक उत्तरदायित्व बिल लेकर आए लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था को लचर बनने से रोकने के लिए कोई कड़ा कानून बनाने की सोच भी ना सके। सीधे तौर पर जनता जिस जनप्रतिनिधि को चुनकर भेजती है वो खुद किसी जिम्मेदारी का बोझ उठाना नहीं चाहता तभी तो हर बार तय समय सीमा के बाद वो उसी हक़ के साथ वोट मांगने पहुंच जाते हैं जैसे जनता का समर्थन उनकी विरासत का हिस्सा हो। कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी एक फैसला दिया था जो नज़ीर बनी। फैसले के मुताबिक कोई सांसद या विधायक निचली अदालत में भी किसी आरोप में दोषी करार दिया जाता है तो उसकी सदस्यता रद्द की जाएगी। उसे अपील लंबित रहने तक चुनाव लड़ने से भी मनाही रहेगी। कोर्ट ने जन-प्रतिनिधित्व कानून की उन धाराओं को भेदभाव पूर्ण माना था जिनमें नेताओं के जेल में रहते हुए भी चुनाव लड़ने की छूट दी गयी थी। देश में दागी सांसदों औऱ विधायकों को रोकने के लिए आम आदमी की विश्वास बहाली के तौर पर इसे बड़ा फैसला करार दिया गया लेकिन इस फैसले की भी काट खोजी गयी और तमाम राजनीतिक दल इस मुद्दे पर एकजुट होकर कानून में संशोधन को राजी हो गए। हालांकि कोर्ट ने इस मामले में जल्द सुनवाई करने की केंद्र की अपील को ठुकरा दिया और जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश भी दिया। गौरतलब है कि सरकार अपने ऊपर लटकती तलवार से खुद को बचाने में लग जाती है लेकिन जनहित से जुड़े मुद्दों पर कानून बनाने या उसे प्रभावी बनाने में उन्हें वर्षों लग जाते हैं। संसद समाज की चिंता ना कर निजी हितों का पोषण करने वाली संस्था बनने लगेगी तो लोगों के भरोसे का क्या होगा? इधर, व्यवस्था के दूसरे पहलू ब्यूरोक्रेसी यानी प्रशासनिक अधिकारियों अथवा अधीनस्थ कर्मचारियों के खिलाफ़ कोई जवाबदेही तय नहीं की जाती रही है जिससे वो अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाह होने का आरोप झेलते रहे हैं। सूचना का अधिकार कानून लागू करने का मकसद यही था कि कार्यों को समय से पूरा ना करने को लेकर जवाबदही तय की जाए और दोषी कर्मचारियों अथवा अधिकारियों पर आर्थिक दंड लगाकर उसे कड़ा संदेश दिया जाए लेकिन प्रचार प्रसार के अभाव में यह व्यवस्था प्रभावी नहीं हो सकी। भारत सूचना का अधिकार लागू करने वाला 61 वां देश बना लेकिन अपने उद्देश्यों को पूरा करने की दिशा में मील का पत्थर ना बन सका। देश में बदलते परिवेश में जवाबदेही का कानून प्रभावी बनाने की जरूरत आन पड़ी है। जिस तरह से वित्त मंत्री ने एक देश एक कर के लिए जीएसटी को लागू किया ठीक उसी तरह वस्तु औऱ सेवाओं की गुणवत्ता के लिए जवाबदेही कानून लागू किया जाए ताकि सेवाओं में त्रुटि के लिए तत्काल कार्रवाई सुनिश्चित हो सके। उपभोक्ता संरक्षण विभाग, उद्योग विभाग, खाद्य एवं आपूर्ति विभाग, कृषि विभाग जैसे विभागों को मिलाकर एक संपूर्ण संस्था बनायी जाए जो तत्काल वस्तु और सेवाओं के दोषपूर्ण होने पर कार्रवाई कर सके। इसके लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट जैसा कोर्ट हर जिले में बनाया जाए ताकि फैसला तुरंत हो सके। अमूमन कार्रवाई के वक्त कभी उस विभाग, कभी इस विभाग जैसी बहानेबाजी बंद हो क्योंकि नई व्यवस्था में सरकार ने अपना खजाना भरना तो सुनिश्चित कर लिया लेकिन उपभोक्ता हितों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। महंगाई रोकने के लिए भी तय समय-सीमा हो क्योंकि जनता इस पूरी व्यवस्था में सबसे निरीह बन चुकी है। खाद्य पदार्थों में मिलावट और असली-नकली सामानों से बाजार पटे पड़े हैं लेकिन प्रशासन और सरकार की कान पर जूं तक नहीं रेंग रहे।आखिर जनता को मिलनेवाली सेवाओं को लेकर सरकार गंभीर क्यों नहीं होतीं, क्या सरकार और प्रशासन का काम केवल टैक्स जमा करना और खजाना भरना है, क्या लोककल्याणकारी सरकार की परिभाषा बदल गयी है या जनता को ऊपर से नीचे निचोड़कर छोड़ देना व्यवस्था की नयी परिभाषा बन चुकी है? ट्रेनों के किराये में जब चाहे बढ़ोतरी कर दी जा रही है लेकिन यात्रियों की सुविधाओं को लेकर कोई गंभीरता क्यों नहीं दिख रही ? आखिर किसी भी व्यवस्था को लेकर जिम्मेदारी तय करने में इतनी लापरवाही क्यों बरती जा रही है? निजी स्कूलों की मनमानी को रोकने को लेकर कोई कड़ा कानून क्यों नहीं या फिर शिक्षा का अधिकार कानून सबके लिए अनिवार्य क्यों नहीं ? कुल मिलाकर कहें तो जनता को केवल करदाता के रूप में समझने वाली सरकार ये भूल जाती है कि दुनिया में जनता ही तख्तापलट करती है और अमूमन तख्तापलट के ज्यादातर आंकड़े आर्थिक कारणों के ही होते हैं। बेहतर तो यही होता कि जिस तरह से एक देश एक कानून लागू करने में सरकार ने जल्दबाजी दिखाई उसी तरह से सेवाओं और वस्तुओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने को भी असरदार कानून साथ में लागू कर दिया जाता तो कम से कम आम जनता का भला होता। इसके लिए जनता की सेवाओं औऱ सुविधाओं की राह में रोड़ा बनने वाली व्यवस्था के जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई भी जरूरी है ताकि देश के अंदर उपभोक्ता हितों की अनदेखी ना हो सके। बहरहाल, जनता के हितों के लिए सरकार अधिकारियों को कब तक जवाबदेह बना पाती है ये देखने वाली बात होगी।

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