नीतीश की एनडीए में घर-वापसी या केवल सत्ता में बने रहने की बेचैनी…

आनंद कौशल/ प्रधान संपादक, देश प्रदेश.मीडिया

बिहार की राजनीतिक ज़मीन पर बोयी गयी अनिश्चितता के बीज से बुधवार को फल निकल आया और एक बार फिर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भाजपा के साथ हो गए। एनडीए में चार सालों से जारी बनवास का जैसा खात्मा हो गया और सत्रह सालों की दोस्ती का दम देखने को मिला। दरअसल, जिस राजनीतिक अनिश्चितताओं को लेकर बहस छिड़ी है वो अचानक से नहीं उभरी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की एक ख़ासियत है कि वो भ्रष्टाचार के मामले में काफी संजीदा हैं व अपनी मिस्टर क्लीन की छवि से बहुत लगाव भी। जिस तरह से आनन-फानन में उन्होंने इस्तीफे का फैसला किया और देर रात सरकार बनाने का दावा भी पेश कर दिया उससे ये बातें साफ हो गयीं कि उऩका इरादा कुछ और ही था। अगर इस फैसले की समीक्षा की जाए तो साफ है कि लालू एंड फैमिली के भ्रष्टाचार में आकंठ डूबने और सीबीआई द्वारा केस दर्ज करने के बाद उनकी किरकिरी हो रही थी। पार्टी के अंदर एक बड़ा धड़ा उन्हें गठबंधन तोड़ने के लिए दबाव बना रहा था। वहीं, लगातार सरकार के कामकाज पर बेजा दबाव भी सुनने को मिल रहा था। हालांकि सरकार पर किसी भी तरह के दबाव से लालू प्रसाद ने हमेशा इनकार किया लेकिन नीतीश के सिपहसलार तेजस्वी और तेजप्रताप को गैरअनुभवी बताते हुए नीतश के साथ उऩके बैठने को लेकर हमेशा तंज कसते थे। इधर, चारा घोटाले में लगातार पेशी और कई मोर्चों पर महागठबंधन में जारी खींचतान ने जदयू को भाजपा के करीब ला दिया। इसके साथ ही पिछले कुछ महीनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक के बाद एक फैसले को सही ठहराते हुए नीतीश ने उन्हें मनोवैज्ञानिक मदद की और अपना भरोसा जताकर ये साफ कर दिया कि आने वाले दिनों में राहें साथ तय की जा सकती हैं। नोटबंदी पर जिस तरह से नीतीश ने मोदी की तारीफ की और इसे अर्थव्यवस्था में मजबूती और भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जरूरी बताया उससे राजनीति के पंडितों ने अर्थ निकालने शुरू कर दिए थे। इधर, लालू की प्रस्तावित रैली को लेकर भी नीतीश संशय की हालत में थे क्योंकि उन्हें पता था कि अब लालू के साथ रिश्ता ज्यादा लंबा रहने पर उन्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है क्योंकि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की चौतरफा आलोचना, अरविंद केजरीवाल पर खुद इतने आरोपों की फेहरिस्त और कांग्रेस का एक के बाद एक गलत कदम इस चिंता को बढ़ा रहा था।

इधर, लेफ्ट और बांकि अन्य पार्टियों को साथ लाने की लालू की क़वायद को भी नीतीश संशय की निगाह से देख रहे थे। बिहार में लगातार बढ़ती आपराधिक वारदातों को लेकर सरकार की किरकिरी पहले से हो रही थी वहीं, शिक्षा विभाग में भी कई घोटालों ने सरकार की ताबूत में कील ठोंकने का काम किया। वैसे जो आरोप नीतीश पर लगाए जा रहे हैं कि तेजस्वी को महज़ बहाना था दरअसल भाजपा के साथ जाना था, ये गलत नहीं है क्योंकि जिस आइडियोलॉजी के चलते उन्होनें भाजपा से किनारा किया था वो आज भी कायम था यो सीधे कहें भाजपा ने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया लेकिन नीतीश ने अपने फैसले पर पलटी मार ली। अब सवाल है कि क्या नीतीश का ये दांव केवल सरकार बचाने तक ही सीमित है या इस फैसले से कई और हित जुड़े हैं। कहा जा रहा है कि बिहार में एनडीए सरकार बनने के बाद केंद्रीय कैबिनेट में भी जदयू शामिल हो सकता है। जदयू के फिलहाल दो सांसद हैं और सूत्र के मुताबिक एक कैबिनेट मंत्री और एक राज्य मंत्री का पद जदयू को मिल सकता है। इधर, भाजपा ने दर्जन भर मंत्रियों के लिए बिहार में जगह मांगी है और इसे मिशन 2019 से जोड़कर देखा जा रहा है। बताया जा रहा है कि नीतीश के साथ आने के बाद भाजपा के लिए देश में चुनौतियां लगभग खत्म हो गयी हैं और अठारह राज्यों में सरकार बन जाने के बाद अब भाजपा बांकि बचे राज्यों के लिए रणनीति बनाने में जुट गयी है। कभी मोदी ने कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया था, शायद ये उसी की बानगी है।बिहार में 2010 के चुनाव में जो बहुमत जनता ने एनडीए को दिया था उसे दुहराये जाने की उम्मीद जतायी जा रही है और 2019 के चुनाव में अगर भाजपा दुबारा सत्ता में आ जाती है तो 2020 में भी एनडीए बिहार की सत्ता पर कब्जा करेगी। दलित, पिछड़ा, महादलित, सवर्ण और मुस्लिम कुल मिलाकर नब्बे फीसदी वोट बैंक पर नज़र रख रही भाजपा अब अपने तमाम फैसलों को अमली जामा पहनाने की कोशिश में है ताकि आने वाले चुनावों में भाजपा क्लीन स्विप कर सके। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी पता है कि विज़नरी नीतीश को आगे कर वो कई राज्यों में प्रदर्शन बेहतर कर सकते हैं। इधर, नीतीश को भी पता है कि देश और दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी की लहर के सामने तमाम मुद्दे धराशायी हो सकते हैं। अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर जिस तरह से भारत के कदम की प्रशंसा हो रही है और देश के अंदर आर्थिक समृद्धि का नया अध्याय लिखा जा रहा है वो उनके साथ आने के बाद और मजबूत होगा। सत्रह सालों की दोस्ती को मिली नयी ताक़त ने नरेंद्र मोदी को भी नयी ऊर्जा से भर दिया है और वो भी मानने लगे हैं कि सितारा उनका साथ दे रहा है। वैसे मुस्लिम वोट बैंक पर कब्जा करनेवाले नीतीश क्या भाजपा के साथ आने के बाद उन्हें खुश रख पाएंगे ये एक बड़ा सवाल है। इधऱ, महागठबंधन तोड़ने को लेकर जिस तरह से नीतीश की मुखालफत हो रही है और सदन से सड़क तक लगातार आरजेडी प्रशंसक हंगामा कर रहे हैं उससे नीतीश की चिंता बढ़ना लाजिमी है लेकिन राज्य की तरक्की के सवाल पर और देश के विकास के नाम पर नीतीश ने भाजपा से हाथ मिलाकर एक बड़ा दांव खेला है। अब देखने वाली बात ये होगी कि राजद और कांग्रेस के बेड़े से दूर निकल आए पंछी की तरह नीतीश अपने बिहार की जनता को क्या फायदा दिला पाते हैं। या फिर कुर्सी बचाने की मजबूरी और सत्ता के भूखे होने का आरोप झेलकर वो अपनी बेचैनी छिपा लेते हैं। बिहार को विशेष राज्य का दर्जा, सवा लाख करोड़ के पैकेज और कई बंद पड़ी परियोजना को दुबारा शुरू करने जैसी चुनौतियों पर केंद्र का रूख क्या रहता है और नीतीश इसे मनवाने में कितना सफल होते हैं इसपर सबकी नज़र है। चलते-चलते हम तो बस इतना कहेंगे…”दोस्त, दोस्ती और वफ़ा सब पुरानी बातें हैं…अब तो मतलब के लिए याराना होते हैं”। यानि इस दोस्ती में किसका कितना मतलब छुपा है ये भी जल्द पता चल जाएगा। फिलहाल कयास, आरोप और प्रत्यारोप के बीच नयी सरकार को देश प्रदेश मीडिया की तरफ से भी हार्दिक शुभकामनाएं।

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