भारत और हमारी न्यू मीडिया

आनंद कौशल, प्रधान संपादक, देश प्रदेश मीडिया

हमारा देश पिछले कुछ सालों में बहुत तेज़ी से बदला है। सूचनाओं के आदान प्रदान के तरीके भी काफी तेज़ गति से बदले। बीते दशकों में संचार तकनीक में आए जबरदस्त बदलाव का सर्वाधिक फायदा सूचना जगत को हुआ है और मीडिया की इस पर निर्भरता बढ़ गई है। भारत, चीन और अमेरिका के बाद दुनिया का सबसे बड़ा इंटरनेट यूजर्स देश है। वेबसाइट, ई-मेल, यूट्यूब, सोशल साइट, ट्विटर, ब्लॉग जैसे ई-कम्युनिकेशन माध्यम पारंपरिक मीडिया को चुनौती दे रहे हैं। आज के दौर में पत्रकारिता सूचना और मनोरंजन के मुख्य स्त्रोत बन गए हैं। लोग अखबार इंटरनेट और मोबाइल पर पहले ही पढ़ ले रहे हैं। सोशल साइट का प्रयोग दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है। वर्तमान में ढाई बिलियन से ज्यादा वेब पेज रोजाना सर्च हो रहे हैं। अखबार औऱ टीवी पर समाचार पढ़ने और देखने की अकुलाहट कम होती दिख रही है और मोबाइल पर उन्हीं ख़बरों को पहले पढ़ लिया जा रहा है। सर्च इंजन के जबरदस्त इस्तेमाल के चलते किसी भी तथ्य को त्वरित गति से क्रास चेक कर लिया जा रहा है जिससे ख़बरों की मौलिकता और गुणवत्ता के बारे में भी पता लगाया जा सकता है। जहां पहले से खबरों की स्रोतों के इतने सारे माध्यम मौजूद थे, वहाँ ‘सोशल मीडिया’ ने सबको पछाड़ते हुए अपनी अलग पहचान बना ली है। इंटरनेट की दुनिया में लोगों के पास असंख्य सोशल मीडिया प्लेटफ़ार्म उपलब्ध हैं, जहां लोग एक-दूसरे से आसानी से संपर्क बना सकते है। अपनी सूचनाओं एवं खबरों को सरलता से आपस में साझा कर सकते हैं। उनमें से सबसे प्रचलित फेसबुक और ट्विटर हैं। मोटे अनुमान के मुताबिक भारत में फेसबुक और ट्विटर पर सक्रिय सदस्यों की संख्या 33 मिलियन से अधिक हैं। ये आंकड़ें अचंभित करने वाले हैं। सोचिए, इतने सारे लोगो के बीच सूचनाओँ के आदान-प्रदान की सीमा क्या होगी ? राजनीति, व्यापार, शिक्षा और मनोरंजन के क्षेत्र मे ‘सोशल मीडिया’ ने अपनी अद्भुत्त शक्ति दिखाई है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी सोशल मीडिया के महत्व की कई मंचों पर स्वीकृति दी है। जिस ‘मोदी लहर’ की मीडिया वाले आए-दिन अपनी ‘न्यूज़-डिबेट’ मे चर्चा करते है, उस लहर को आक्रामक बनाने मे ‘सोशल मीडिया’ की अहम भूमिका रही है। सोशल मीडिया ने सामाजिक कुरुतियों को उजागर करने और जागरूकता फैलाने में भी अहम भूमिका निभाई है। सोशल मीडिया सरकार पर दबाव बनाने का प्रभावकारी जरिया बन गया है। ‘आरुषि-हेमराज’ हत्याकांड, ‘दामिनी बलात्कार कांड’, गीतिका-गोपाल कांड़ा’ जैसे अनेक मामलों में सोशल मीडिया ने इंसाफ की जंग लड़ी है। जिस तरह से अखबारों और टीवी चैनलों पर किसी मुद्दे पर चर्चा की जाती है ठीक उसी तरह से अलग-अलग बेवसाइट इस मुद्दे पर लगातार अपडेट ख़बरें शेयर करके लोगों की बड़ी संख्या को प्रभावित करता रहता है। परंपरागत मीडिया के प्रभावी माध्यम माने जाने वाले टेलीविजन को आम जनता देखती है। उसे कोसती भी है। क्या इसे हम टीवी चैनलों की विश्वसनीयता पर संकट कहें ? टीवी चैनलों के आने के बाद जो कुछ गलत हो रहा था, उसे लोगों के बीच में लाने का काम शुरू हुआ। आने वाले समय में सोशल मीडिया एक प्रभावकारी और भरोसेमंद तथा त्वरित पत्रकारिता का स्थान लेगी। पश्चिमी देशों में ऐसा होने लगा है। सोशल और यहां तक कि टीवी पत्रकारिता ने बहुत बड़ी क्रांति ला दी है। इसने अभिजात्य संस्कृति को ध्वस्त किया है। वेबसाईट, ईमेल, ब्लॉग, सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटस, जैसे माइ स्पेस, आरकुट,फेसबुक आदि, माइक्रो ब्लागिंग साइट टि्वटर, ब्लाग्स, फॉरम, चैट वैकल्पिक मीडिया का हिस्सा हैं| यही एक ऐसा मीडिया है जिसने अमीर, गरीब और मध्यम वर्ग के अंतर को समाप्त किया है| अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा अब बढ़ गया है। निश्चित तौर पर वैकल्पिक मीडिया में अपार संभावनायें है। दूसरी ओर, यह सच उजागर करने का क्षमता भी रखता है। ठीक इसी तरह से अलग-अलग न्यूज़ साइट जिस त्वरित गति से ख़बरों को आप तक लाने का काम करती है उसने पत्रकारिता के आयाम ही बदल दिए हैं। कम खर्च में किसी भी ख़बर को तुरंत आपतक पहुंचाने में इस न्यू मीडिया ने सबको पीछे छोड़ दिया है। सबसे बड़ी बात है कि न्यू मीडिया के इस प्रयोग में खबरों की छपाई या प्रसारण से जुड़े खर्चे नहीं होते जिससे बेहद इस सस्ते माध्यम में बड़ी संख्या में लोग जुड़े हुए हैं। वहीं, सुदूर गांवों तक की ख़बर जिससे लोग अछूते रहे हैं उसे भी आजकल बड़ी आसानी से किसी भी न्यूज़ बेवसाइट पर पढ़ा जा सकता है। इन्हीं ख़बरों को फेसबुक और ट्वीटर पर शेयर करके इसकी प्रसार संख्या को काफी तेज़ी से बढ़ाया जा सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि न्यू मीडिया आने वाले दिनों में पारंपरिक मीडिया के एकाधिकार को खत्म कर देगी। सूचना को कौन तेजी से पहुंचाता है अब इसकी बात होने लगी है और इस कड़ी में पारंपरिक मीडिया अथवा टीवी चैनल थोड़े पीछे हो गए हैं। सोशल मीडिया और न्यू मीडिया की इस बढ़ती दखल ने राजनेताओं को भी बेहतर मीडिया मैनेजमेंट की जरूरत को बढ़ा दिया है। वह दिन दूर नहीं जब इस मीडिया के बढ़ते स्वरूप को नियमन के दायरे में भी लाया जाए क्योंकि इसी मीडिया की ये बड़ी विडंबना है कि ख़बरों की मौलिकता और विश्वसनीयता को लेकर कई सारे खतरें भी हैं। ये जरूरी नहीं कि कोई ख़बर सही हो और इसी सही गलत के चक्कर में वायरल होती ख़बर से कई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। सवाल ये है कि किसी भी मीडिया के अपने फायदे और नुकसान हैं लेकिन क्या नुकसान की चिंता कर हम इसके फायदे से दूर हो जाएं। जरूरी तो यही है कि इसके लिए भी नियम बनाएं जाएं ताकि न्यू मीडिया भविष्य के बेहतर विकल्प के तौर पर देखे जाएं। तकनीकी विस्तार के कारण न्यू मीडिया और सोशल मीडिया का समाज में दखल और वर्चस्व इतना बढ़ता जा रहा है कि सरकार इसके लिए नियामक प्राधिकरण गठित करने की सोच भी रही है। प्रेस काउंसिल आफ इंडिया हमेशा से कहता रहा है कि नागरिक समाज के प्रति मीडिया को जवाबदेह होना होगा। काउंसिल की चिंता समाज में उसे भरोसेमंद बनाने को लेकर है ताकि लोगों का मीडिया से जुड़ा भरोसा कायम रहे। याद रखना होगा कि लोकतंत्र के चौथे खंभे के रूप में हमारी जिम्मेदारी तीनों से बहुत ज्यादा है क्योंकि हमतक समाज के अंतिम पायदान पर बैठे शख्स की आवाज़ भी पहुंचती है, अब ये हमें ही तय करना होगा कि हम उनकी आवाज़ बनेंगे या फिर उनकी आवाज़ ही अनसुनी कर दी जाएगी।

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