एक तीर से दो निशाने साध रहा जदयू का तीर, प्रशांत किशोर के सहारे नीतीश ने चला है बड़ा दांव

आनंद कौशल- प्रधान संपादक, देश-प्रदेश

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर को जदयू का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर एक तीर से कई शिकार किए हैं। प्रशांत किशोर एक महीने पहले ही जदयू में शामिल हुए हैं लेकिन पार्टी के अंदर एक बड़ा धड़ा पार्टी में उनकी हैसियत का अंदाजा उनके ज्वाइन करने के समय से ही लगा रहा था। पार्टी में प्रशांत किशोर से पूर्व उपाध्यक्ष की कुर्सी खाली थी। कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौधरी, जदयू में इससे पहले अघोषित तौर पर नंबर दो की छवि वाले आर.सी.पी. सिंह और नीतीश के दिल्ली के सिपहेसलार के सी त्यागी सरीखे नेताओं के मुक़ाबले नंबर दो की कुर्सी देकर नीतीश ने पार्टी के अंदर बड़ा संदेश दिया है। हालांकि प्रशांत किशोर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाने का एक मकसद और हल होता दिखाई दे रहा है वो है नीतीश का मास्टर स्ट्रोक यानी जदयू का फारवर्ड कार्ड। जदयू अध्यक्ष नीतीश कुमार हमेशा कहते रहे हैं कि वो हर समाज का विकास चाहते हैं और हर तबके का। असल में सबका साथ सबका विकास भी तो यही है। जिस तरह से पिछले कुछ वर्षों में मुख्यमंत्री ने वोट की चिंता किए बगैर योजनाओं को अमली जामा पहनाया वो काबिले तारीफ है। प्रशांत किशोर की नंबर दो की ताजपोशी से नीतीश ने फारवर्ड कार्ड खेलकर बिहार में नाराज़ चल रहे तबके को भी साधने की कोशिश की है। हालांकि सब जानते रहे हैं कि जदयू में नीतीश और आर.सी.पी के अलावा कोई भी फैसले लेने वाला नहीं है, अब इस फैसले ने सबको सकते में भी डाल दिया है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा, अतिपिछड़ा, अल्पसंख्यक, महिला और युवाओं को फोकस में रखकर नीतियां निर्माण करने वाले नीतीश को पता है कि जदयू को एक विशिष्ट मैनेजर की जरूरत है जो पार्टी को आगे ले जा सके।

जानकार बताते हैं कि देश भर में पार्टी का विस्तार प्रशांत किशोर की रणनीति का ही हिस्सा है। प्रशांत किशोर के रूप में जदयू को तरकस का वो तीर मिला है जो निशाने से नहीं चूकेगा। मुख्यमंत्री जानते हैं कि प्रशांत किशोर को आगे कर जदयू अपने आधार वोट के साथ ही तमाम तबकों का समर्थन हासिल कर लेगा। अभी लोकसभा चुनाव में कम वक्त बचे हैं लिहाज़ा प्रशांत किशोर की रणनीति अभेद्य, अद्भुत और अकल्पनीय बनने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन क्या केवल प्रशांत किशोर के नाम से नीतीश बहुसंख्यक वोटरों को अपने पक्ष में कर पायेंगे क्योंकि एस.सी/एस.टी एक्ट को लेकर जिस तरह से भाजपा और उसके सहयोगियों की किरकिरी हो रही है उससे ये तो साफ है कि फारवर्ड वोटों के लिए सबको कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी। जानकार बताते हैं कि जदयू की चुनावी तैयारी में अल्पसंख्यकों के साथ ही, पिछड़ा, अतिपिछड़ा और महादलित वोटों की बड़ी भूमिका होगी लेकिन नीतीश को सबसे ज्यादा भरोसा इस बार भी महिला वोटरों पर है क्य़ोंकि पिछले दो सालों में महिलाओं को केंद्र में रखकर जदयू सुप्रीमो ने कई योजनाओं को मूर्त रूप प्रदान किया है। सभी सरकारी सेवाओं में 35 फीसदी आरक्षण देकर महिलाओं के बड़े आधार वोट को अपने पाले में करने की कोशिश की जा रही है वहीं, युवाओं के लिए कई कल्याणकारी योजनाओं पर भी नीतीश को पूरा भरोसा है। सबसे बड़ी बात ये भी है कि शराबबंदी, दहेज प्रथा और बाल विवाह के खिलाफ़ सशक्त अभियान चलाकर नीतीश ने आधी आबादी को अपने पाले में करने की पुरज़ोर कोशिश की है और सबको इसी का इंतजार रहेगा कि इसका फायदा ले पाने में नीतीश कामयाब होंगे या नहीं। प्रशांत किशोर की चुनावी रणनीति क्या होगी, फिलहाल कह पाना मुश्किल है लेकिन उनके नजदीकी बताते हैं कि प्रशांत किशोर ने चुनाव जीतने का ब्लू प्रिंट पहले ही दे दिया है और इसलिए मुख्यमंत्री का आत्मविश्वास हर प्रतिकूल परिस्थितियों से टकराने के लिए तैयार है। केंद्र को कई मोर्चों पर लगातार जनता की आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है इस तरह से जदयू के लिए भी ये मुनासिब है कि वह प्रदेश में जनता के बीच कुछ अलग कर अपनी स्थिति मजबूत करे।

मुख्यमंत्री एक के बाद एक जिस तरह से कल्याणकारी योजनाओं की शुरूआत कर रहे हैं उससे साफ है कि बहुत बड़े वोट बैंक को साधने के साथ ही नीतीश अगड़ों को भी अपने साथ लाने के लिए बड़ी क़वायद कर सकते हैं। प्रशांत किशोर की नंबर दो की हैसियत से जदयू का बड़ा तबका भले ही नाराज़ हो लेकिन ये भी साफ हो गया है कि नीतीश ने इस फैसले से एक तीर कई शिकार किए हैं। जिनलोगों को ये लग रहा था कि जदयू के अंदर आंतरिक लोकतंत्र नहीं है उनको इस फैसले ने सोचने पर मजबूर कर दिया है। अब सबकी निगाहें जदयू के नए वज़ीर प्रशांत किशोर की तरफ होगी कि उनके तरकस में ऐसे कौन से तीर हैं जिसे समय रहते इस्तेमाल कर जदयू को राज्य की सत्ता दुबारा मिल सकेगी और केंद्र में भी नीतीश की हैसियत को किसी भी कीमत पर दरकिनार नहीं किया जा सकेगा। राजद ने इससे पहले फारवर्ड कार्ड खेलकर मनोज झा को राज्यसभा पहुंचाया और अपनी परिवारवाद की छाप को कुछ हद तक दूर करने में सफलता पायी। इधर, कांग्रेस ने भी मदन मोहन झा को अपना प्रदेश अध्यक्ष बनाकर नाराज हो रहे तबके को साधने की कोशिश की। अब जदयू के मुखिया नीतीश ने भी प्रशांत किशोर पांडेय को अपना उपाध्यक्ष बनाकर अगड़ों के बीच अपनी स्वीकार्यता साबित की है, अब अंजाम चाहे जो हो, इतना तो साफ है कि प्रशांत किशोर के चुनावी मैनेजमेंट से कुछ हद तक राज्य में एंटी इनकंबेंसी के दुष्प्रभावों को भी रोका जा सकेगा।

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